अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒पाम॒ग्निस्त॒नूभिः॑ संविदा॒नो य ओष॑धीनामधि॒पा ब॒भूव॑ । स नो॑ व॒र्षं व॑नुतां जा॒तवे॑दाः प्रा॒णं प्र॒जाभ्यो॑ अ॒मृतं॑ दि॒वस्परि॑ ॥ (१०)
बादलों में स्थित जलों के शरीर से मिली हुई बिजली रूपी अग्नि पैदा होने वाली जड़ीबूटियों की स्वामिनी है. उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव प्रजाओं को जीवन देने वाली तथा स्वर्ग का अमृत प्राप्त कराने वाली वर्षा हमें प्रदान करें. (१०)
The agni of electricity received from the body of water located in the clouds is the owner of the herbs produced. May agni dev, the knower of the creatures born, give us the rain that gives life to the subjects and gives us the nectar of heaven. (10)