हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.15.6

कांड 4 → सूक्त 15 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
अ॒भि क्र॑न्द स्त॒नया॒र्दयो॑द॒धिं भूमिं॑ पर्जन्य॒ पय॑सा॒ सम॑ङ्धि । त्वया॑ सृ॒ष्टं ब॑हु॒लमैतु॑ व॒र्षमा॑शारै॒षी कृ॒शगु॑रे॒त्वस्त॑म् ॥ (६)
हे पर्जन्य! चारों ओर गर्जन करो एवं मेघों में प्रवेश कर के शब्द करो. तुम बरसे हुए जल से धरती को सींचो. तुम्हारे द्वारा प्रेरित गाढ़ा एवं वर्षा करने में समर्थ बादल आए. जल की धाराओं का इच्छुक एवं कृश किरणों वाला सूर्य छिप जाए. (६)
O Parjanya! Roar around and enter the clouds and make words. You water the earth with rain water. The thick and rainy clouds inspired by you came. The sun with the desired and dark rays of the streams of water should be hidden. (6)