हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.25.1

कांड 4 → सूक्त 25 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
वा॒योः स॑वि॒तुर्वि॒दथा॑नि मन्महे॒ यावा॑त्म॒न्वद्वि॒शथो॒ यौ च॒ रक्ष॑थः । यौ विश्व॑स्य परि॒भू ब॑भू॒वथु॒स्तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (१)
वायु और सविता के वेदों में वर्णन किए गए कर्मो को मैं जानता हूं. हे वायु एवं सविता देव! तुम दोनों स्थावर और संगम जीवों में प्रवेश करते हो एवं रक्षा करते हो. तुम दोनों विश्व की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हो. तुम दोनों हमें पाप से छुड्ाओ. (१)
I know the deeds described in the Vedas of Vayu and Savita. O Vayu and Savita Dev! You both enter and protect the real and confluence creatures. You both were born to protect the world. You two redeem us from sin. (1)