हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
वा॒योः स॑वि॒तुर्वि॒दथा॑नि मन्महे॒ यावा॑त्म॒न्वद्वि॒शथो॒ यौ च॒ रक्ष॑थः । यौ विश्व॑स्य परि॒भू ब॑भू॒वथु॒स्तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (१)
वायु और सविता के वेदों में वर्णन किए गए कर्मो को मैं जानता हूं. हे वायु एवं सविता देव! तुम दोनों स्थावर और संगम जीवों में प्रवेश करते हो एवं रक्षा करते हो. तुम दोनों विश्व की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हो. तुम दोनों हमें पाप से छुड्ाओ. (१)
I know the deeds described in the Vedas of Vayu and Savita. O Vayu and Savita Dev! You both enter and protect the real and confluence creatures. You both were born to protect the world. You two redeem us from sin. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
ययोः॒ संख्या॑ता॒ वरि॑मा॒ पार्थि॑वानि॒ याभ्यां॒ रजो॑ युपि॒तम॒न्तरि॑क्षे । ययोः॑ प्रा॒यं नान्वा॑नशे॒ कश्च॒न तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (२)
जिन वायु और सविता देव के महत्त्व जनों के द्वारा भलीभांति प्रसिद्ध हैं, जिन दोनों के द्वारा आकाश में जल को धारण किया जाता है तथा कोई अन्य देव जिन वायु और सविता के उत्तम गमन को प्राप्त नहीं कर पाता, वे दोनों हमें पाप से मुक्त करें. (२)
May the importance of Vayu and Savita Dev, who are well known by the people, both of whom hold water in the sky and no other God who is able to get the good movement of Air and Savita, both of them should free us from sin. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
तव॑ व्र॒ते नि वि॑शन्ते॒ जना॑स॒स्त्वय्युदि॑ते॒ प्रेर॑ते चित्रभानो । यु॒वं वा॑यो सवि॒ता च॒ भुव॑नानि रक्षथ॒स्तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (३)
हे सविता! तुम से संबंधित कर्म में लोग नियम से लगे रहते हैं. हे विचित्र दीप्ति वाले सूर्य! तुम्हारे निकलने पर सभी लोग अपनेअपने काम में लग जाते हैं. तुम दोनों अर्थात्‌ वायु और सविता लोकों की रक्षा करते हो. तुम दोनों हमें पाप से बचाओ. (३)
O Savita! People are engaged in rules in karma related to you. O sun with strange brightness! When you leave, everyone gets involved in their own work. You protect both i.e. air and savita worlds. You both save us from sin. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
अपे॒तो वा॑यो सवि॒ता च॑ दुष्कृ॒तमप॒ रक्षां॑सि॒ शिमि॑दां च सेधतम् । सं ह्यू॒र्जया॑ सृ॒जथः॒ सं बले॑न॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (४)
हे वायु एवं सविता देव! तुम मेरे पाप को मुझ से दूर करो. उपद्रवकारी राक्षसों तथा जलती हुई कृत्या राक्षसी को यहाँ से दूर भगाओ. तुम ऊर्जा और बल से मेरा सृजन करो तथा मुझे पाप से बचाओ. (४)
O Vayu and Savita Dev! You take away my sin from me. Drive the rowdy demons and the burning krita rakshasi away from here. Create me with energy and strength and save me from sin. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
र॒यिं मे॒ पोषं॑ सवि॒तोत वा॒युस्त॒नू दक्ष॒मा सु॑वतां सु॒शेव॑म् । अ॑य॒क्ष्मता॑तिं॒ मह॑ इ॒ह ध॑त्तं॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (५)
सविता और वायु मेरे लिए धन और पुष्टि को प्रेरित करें. ये दोनों मेरे शरीर में सुख एवं बल प्रदान करें. इस यजमान के शरीर में ये दोनों रोगहीनता तथा तेज धारण करें और हमें पाप से बचाएं. (५)
Savita and Vayu inspire wealth and confirmation for me. May these two bring happiness and strength to my body. In the body of this host, both of them should wear diseaselessness and radiance and save us from sin. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
प्र सु॑म॒तिं स॑वितर्वाय ऊ॒तये॒ मह॑स्वन्तं मत्स॒रं मा॑दयाथः । अ॒र्वाग्वा॒मस्य॑ प्र॒वतो॒ नि य॑च्छतं॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (६)
हे सविता एवं वायु देव! हमारी रक्षा के लिए हमें उत्तम बुद्धि प्रदान करो तथा दीप्तिशाली एवं मादक सोमरस को पी कर प्रसन्न बनो. तुम दोनों उत्तम धन को हमारी ओर प्रेरित करो तथा हमें पाप से छुड़ाओ. (६)
O Savita and Vayu Dev! Give us good intelligence to protect us and be happy by drinking the radiant and intoxicating Somersa. Both of you inspire the best wealth towards us and redeem us from sin. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 25
उ॒प श्रेष्ठा॑ न आ॒शिषो॑ दे॒वयो॒र्धाम॑न्नस्थिरन् । स्तौमि॑ दे॒वं स॑वि॒तारं॑ च वा॒युं तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (७)
वायु और सविता देव के तेज के विषय में हमारी उत्तम एवं फलदायक प्रार्थनाएं उपस्थित हैं. हम धन आदि गुणों से युक्त वायु एवं सविता देव की स्तुति करते हैं. ये दोनों हमें पाप से छुड़ाएं. (७)
Our best and fruitful prayers are present about the glory of Vayu and Savita Dev. We praise Vayu and Savita Dev with qualities like wealth etc. Let these two save us from sin. (7)