अथर्ववेद (कांड 4)
ययोः॒ संख्या॑ता॒ वरि॑मा॒ पार्थि॑वानि॒ याभ्यां॒ रजो॑ युपि॒तम॒न्तरि॑क्षे । ययोः॑ प्रा॒यं नान्वा॑नशे॒ कश्च॒न तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (२)
जिन वायु और सविता देव के महत्त्व जनों के द्वारा भलीभांति प्रसिद्ध हैं, जिन दोनों के द्वारा आकाश में जल को धारण किया जाता है तथा कोई अन्य देव जिन वायु और सविता के उत्तम गमन को प्राप्त नहीं कर पाता, वे दोनों हमें पाप से मुक्त करें. (२)
May the importance of Vayu and Savita Dev, who are well known by the people, both of whom hold water in the sky and no other God who is able to get the good movement of Air and Savita, both of them should free us from sin. (2)