अथर्ववेद (कांड 4)
अधि॑ नो ब्रूतं॒ पृत॑नासूग्रौ॒ सं वज्रे॑ण सृजतं॒ यः कि॑मी॒दी । स्तौमि॑ भवाश॒र्वौ ना॑थि॒तो जो॑हवीमि॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (७)
हे पराजित न होने वाले भव और शर्व! हमारे विषय में पक्षपात के वचन कहो एवं संग्रामों में हमारे बल को पराजित न होने वाला बनाओ. मैं द्यावा और पृथ्वी की स्तुति करता हूं. मुझे पाप से छुड़ाएं. (७)
O unstroubled bhava and sharva! Say promises of partiality about us and make our force unaltered in battles. I praise Dyava and the earth. Redeem me from sin. (7)