हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.29.1

कांड 4 → सूक्त 29 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 29
म॒न्वे वां॑ मित्रावरुणावृतावृधौ॒ सचे॑तसौ॒ द्रुह्व॑णो॒ यौ नु॒देथे॑ । प्र स॒त्यावा॑न॒मव॑थो॒ भरे॑षु॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (१)
हे ऋत्‌ अर्थात्‌ सत्य, जल अथवा यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं समान ज्ञान वाले मित्र और वरुण! मैं तुम दोनों के महत्त्व की स्तुति करता हूं. तुम द्रोह करने वालों का हनन कर देते हो. बुम सत्यप्रतिज्ञ पुरुष की संग्राम में रक्षा करते हो. ऐसे मित्र और वरुण मुझे पाप से बचाएं. (१)
O Rit means friends and Varuna who enhance truth, water or yajna and have the same knowledge! I appreciate the importance of both of you. You violate those who are hostile. You protect a man who is truthful in the struggle. May such friends and Varun save me from sin. (1)