अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हं सोम॑माह॒नसं॑ बिभर्म्य॒हं त्वष्टा॑रमु॒त पू॒षणं॒ भग॑म् । अ॒हं द॑धामि॒ द्रवि॑णा ह॒विष्म॑ते सुप्रा॒व्या॑ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥ (६)
निचोड़ने योग्य सोमरस को अथवा शत्रुओं का विनाश करने एवं स्वर्ग में स्थित सोम को मैं ही धारण करती हूं. त्वष्टा, पूषा और भव को भी मैं ही धारण करती हूं. हवि लिए हुए, देवों को हवि प्राप्त कराने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के लिए यज्ञ के फल के रूप में धन मैं ही धारण करती हूं. (६)
I hold the squeezeable somaras or the soma in heaven to destroy enemies and in heaven. I also wear Tvashta, Pusha and Bhava. I hold money as the fruit of yajna for the host who takes havi, who receives havi to the gods and squeezes someras. (6)