अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हं सु॑वे पि॒तर॑मस्य मू॒र्धन्मम॒ योनि॑र॒प्स्वन्तः स॑मु॒द्रे । ततो॒ वि ति॑ष्ठे॒ भुव॑नानि॒ विश्वो॒तामूं द्यां व॒र्ष्मणोप॑ स्पृशामि ॥ (७)
इस दिखाई देने वाले प्रपंच के ऊपरी भाग अर्थात् सत्यलोक में वर्तमान इस प्रपंच के जनक को मैं जानती हूं. इस जगत् के कारण रूप मेरा उत्पत्ति स्थान सागर के जलों में स्थित हैं. तेज का कारण होने से मैं भुवनों को प्रकाशित करती हूं. मैं इस देह से स्वर्ग का स्पर्श करती हूं. (७)
I know the father of this prapanch present in the upper part of this visible prapancha i.e. Satyalok. Due to this world, my place of origin is located in the waters of the ocean. Being the reason for the fast, I publish bhuvanas. I touch heaven with this body. (7)