अथर्ववेद (कांड 4)
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम् । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (१)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से हमारा पाप नष्ट हो जाए. तुम हमारे धन को सभी ओर से समृद्ध करो और हमारे पाप को नष्ट करो. (१)
O agni! May our sin be destroyed by your grace. Enrich our wealth on all sides and destroy our sin. (1)