हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.33.2

कांड 4 → सूक्त 33 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 33
सु॑क्षेत्रि॒या सु॑गातु॒या व॑सू॒या च॑ यजामहे । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (२)
हे अग्नि! हम शोभन क्षेत्र एवं शोभन मार्ग पाने की इच्छा से तुम्हारा हवन करते हैं. तुम हमारे धन को सभी ओर समृद्ध करो तथा हमारे पाप को नष्ट करो. (२)
O agni! We perform your havan with the desire to get shobhan kshetra and shobhan marg. Enrich our wealth all over and destroy our sin. (2)