हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
Home » Atharvaved » Kand 4 » Sukta 33 अथर्ववेद (कांड 4) अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम् । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (१)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से हमारा पाप नष्ट हो जाए. तुम हमारे धन को सभी ओर से समृद्ध करो और हमारे पाप को नष्ट करो. (१)
O agni! May our sin be destroyed by your grace. Enrich our wealth on all sides and destroy our sin. (1)
अथर्ववेद (कांड 4) सु॑क्षेत्रि॒या सु॑गातु॒या व॑सू॒या च॑ यजामहे । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (२)
हे अग्नि! हम शोभन क्षेत्र एवं शोभन मार्ग पाने की इच्छा से तुम्हारा हवन करते हैं. तुम हमारे धन को सभी ओर समृद्ध करो तथा हमारे पाप को नष्ट करो. (२)
O agni! We perform your havan with the desire to get shobhan kshetra and shobhan marg. Enrich our wealth all over and destroy our sin. (2)
अथर्ववेद (कांड 4) प्र यद्भन्दि॑ष्ठ एषां॒ प्रास्माका॑सश्च सू॒रयः॑ । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (३)
हे अग्नि! मैं उन स्तोताओं के मध्य श्रेष्ठ स्तोता हूं और मेरे ज्ञानी पुत्र आदि भी स्तोताओं में शरेष्ठ हैं, इसलिए तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (३)
O agni! I am the best psalm among those psalms and my wise sons etc. are also among the psalms, so you destroy our sin. (3)
अथर्ववेद (कांड 4) प्र यत्ते॑ अग्ने सू॒रयो॒ जाये॑महि॒ प्र ते॑ व॒यम् । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (४)
हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता जो तुम्हारी कृपा से जन्म लेते हैं. इसलिए हम विद्वान् भी तुम्हारी स्तुति के कारण पुत्र, पौत्र आदि से समृद्ध हों. तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (४)
O agni! Your psalmists who are born by Your grace. Therefore, we scholars should also be enriched with sons, grandsons etc. because of your praise. You destroy our sin. (4)
अथर्ववेद (कांड 4) प्र यद॒ग्नेः सह॑स्वतो वि॒श्वतो॒ यन्ति॑ भा॒नवः॑ । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (५)
बलवान अग्नि की किरणें सभी ओर प्रवर्तित होती हैं, इसलिए तुम हमारे पापों को नष्ट करो. (५)
The rays of strong agni are transmitted everywhere, so you destroy our sins. (5)
अथर्ववेद (कांड 4) त्वं हि वि॑श्वतोमुख वि॒श्वतः॑ परि॒भूर॑सि । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (६)
हे अग्नि! तुम सभी ओर मुख वाले एवं सर्वव्यापक हो. तुम हमारे पाप नष्ट करो. (६)
O agni! You are all-faced and omnipresent. You destroy our sins. (6)
अथर्ववेद (कांड 4) द्विषो॑ नो विश्वतोमु॒खाति॑ ना॒वेव॑ पारय । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (७)
हे सभी ओर मुख वाले अग्नि! जिस प्रकार लोग नाव के द्वारा उस पार पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो तथा हमारे पापों को नष्ट करो. (७)
O agni facing all sides! Just as people reach across it by boat, so remove our enemies from us and destroy our sins. (7)
अथर्ववेद (कांड 4) स नः॒ सिन्धु॑मिव ना॒वाति॑ पर्षा स्व॒स्तये॑ । अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥ (८)
हे उक्त गुणों वाले अग्नि! जिस प्रकार नाव के द्वारा सागर को पार करते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो एवं हमारे पापों को नष्ट करो. (८)
O agni with the above qualities! Just as we cross the ocean by boat, so remove our enemies from us and destroy our sins. (8)