हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.36.10

कांड 4 → सूक्त 36 → मंत्र 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
अ॒भि तं निरृ॑तिर्धत्ता॒मश्व॑मिवाश्वाभि॒धान्या॑ । म॒ल्वो यो मह्यं॒ क्रुध्य॑ति॒ स उ॒ पाशा॒न्न मु॑च्यते ॥ (१०)
पाप देवता मेरे शत्रु को उसी प्रकार बांध लें, जिस प्रकार रस्सी घोड़े को बांधती हैं. जो शत्रु मेरे लिए क्रोध करता है, वह शत्रु पाप देवता निर्त्ृति के पाश से न छूटे. (१०)
May the sin god bind my enemy in the same way as the rope binds the horse. The enemy who is angry for me, that enemy sin god should not be released from the loop of nirtiti. (10)