हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.36.9

कांड 4 → सूक्त 36 → मंत्र 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
ये मा॑ क्रो॒धय॑न्ति लपि॒ता ह॒स्तिनं॑ म॒शका॑ इव । तान॒हं म॑न्ये॒ दुर्हि॑ता॒ञ्जने॒ अल्प॑शयूनिव ॥ (९)
जो पिशाच मिल कर मुझे इस प्रकार क्रोधित करते हैं, जिस प्रकार मच्छर हाथी को क्रोध बढ़ा देते हैं; मैं उन्हें उसी प्रकार हनन के योग्य दुष्ट जानता हूं, जिस प्रकार जनसंचार के स्थान पर छोटे शरीर वाले कीड़े होते हैं. (९)
The vampires who together make me angry, just as mosquitoes increase the anger of the elephant; I know them to be evil worthy of abuse, just as there are small-bodied insects in place of mass communication. (9)