हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
तान्त्स॒त्यौजाः॒ प्र द॑हत्व॒ग्निर्वै॑श्वान॒रो वृषा॑ । यो नो॑ दुर॒स्याद्दिप्सा॒च्चाथो॒ यो नो॑ अराति॒यात् ॥ (१)
सच्चे बल वाले, वैश्वानर एवं गर्भाधान में समर्थ अग्नि उन शत्रुओं को जलाएं, जो हमारे प्रति दुष्टों के समान आचरण करें, जो हमारी हिंसा करना चाहें तथा जो हमारे प्रति शत्रु के समान आचरण करें. (१)
May the agni of true strength, vaishwanar and capable of conception burn those enemies who treat us like the wicked, who want to do violence to us and who treat us as enemies. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
यो नो॑ दि॒प्सददि॑प्सतो॒ दिप्स॑तो॒ यश्च॒ दिप्स॑ति । वै॑श्वान॒रस्य॒ दंष्ट्र॑योर॒ग्नेरपि॑ दधामि॒ तम् ॥ (२)
जो शत्रु हिंसा की इच्छा न करने वाले मुझ को मारना चाहता है तथा जिस हिंसा की इच्छा करने वाले को मैं मारना चाहता हूं, उस को मैं वैश्वानर अग्नि की दाढ़ों में रखता हूं. (२)
The enemy who wants to kill me who does not want violence and the one who wants to kill the one who wants to kill, I keep it in the molars of the vaishvanar agni. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
य आ॑ग॒रे मृ॒गय॑न्ते प्रतिक्रो॒शेऽमा॑वा॒स्ये॑ । क्र॒व्यादो॑ अ॒न्यान्दिप्स॑तः॒ सर्वां॒स्तान्त्सह॑सा सहे ॥ (३)
युद्ध भूमि में जो पिशाच हमें खाने के लिए खोजते हैं तथा शत्रुओं द्वारा किए गए आक्रोश के कारण अमावस्या की आधी रात में हमें मारना चाहते हैं, हम मंत्रों के प्रभाव से उन्हें पराजित करते हैं. (३)
In the battlefield, the vampires who search for us to eat and want to kill us in the middle of the new moon night due to the anger caused by the enemies, we defeat them with the effect of mantras. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
सहे॑ पिशा॒चान्त्सह॒सैषां॒ द्रवि॑णं ददे । सर्वा॑न्दुरस्य॒तो ह॑न्मि॒ सं म॒ आकू॑तिरृध्यताम् ॥ (४)
मैं बल के द्वारा राक्षसों को पराजित करता हूं तथा उन राक्षसों के धन को अपने अधिकार में करता हूं. मैं द्वेष करने वाले सभी शत्रुओं को मारता हूं. मेरा इष्ट फल विषयक संकल्प और सुख समृद्ध हो. (४)
I defeat the demons by force and take possession of the wealth of those demons. I kill all hostile enemies. May my desired fruit-related resolve and happiness prosper. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
ये दे॒वास्तेन॒ हास॑न्ते॒ सूर्ये॑ण मिमते ज॒वम् । न॒दीषु॒ पर्व॑तेषु॒ ये सं तैः प॒शुभि॑र्विदे ॥ (५)
हे अग्नि आदि देवो! जो पशु, राक्षस, पिशाच आदि से बचना चाहते हैं तथा उन्हें छोड़ कर सूर्य के समान वेग से भागते हैं तथा जो पशु नदियों और तीर्थो में घूमते हैं, तुम्हारे प्रभाव से मैं उन राक्षस आदि को मार कर उन पशुओं के साथ संयुक्त होता हूं. (५)
O God of agni! Those who want to avoid animals, demons, vampires, etc. and leave them and run at the same speed as the sun and the animals that roam in rivers and pilgrimages, under your influence, I kill those demons etc. and join those animals. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
तप॑नो अस्मि पिशा॒चानां॑ व्या॒घ्रो गोम॑तामिव । श्वानः॑ सिं॒हमि॑व दृ॒ष्ट्वा ते न वि॑न्दन्ते॒ न्यञ्च॑नम् ॥ (६)
मैं मंत्रों के सामर्थ्य से पिशाचों को उसी प्रकार संताप देता हूं, जिस प्रकार बाघ गायों के स्वामियों को दुःखी करता है. सिंह को देख कर जिस प्रकार कुत्ता भय से छिप जाता है, उसी प्रकार मेरे मंत्रों के प्रभाव से वे अधोगति पाते हैं. (६)
I annoy vampires with the power of mantras in the same way as a tiger hurts the owners of cows. Just as the dog hides from fear by looking at the lion, so with the effect of my mantras, they get degradation. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
न पि॑शा॒चैः सं श॑क्नोमि॒ न स्ते॒नैर्न व॑न॒र्गुभिः॑ । पि॑शा॒चास्तस्मा॑न्नश्यन्ति॒ यम॒हं ग्राम॑मावि॒शे ॥ (७)
मैं पिशाचों, चोरों और वन में रहने वाले लुटेरों से न मिलूं, मैं जिस ग्राम में प्रवेश कर के निवास करूं, उस से पिशाच भाग जाएं. (७)
I should not meet vampires, thieves and robbers living in the forest, vampires should run away from the village I enter and live in. (7)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 36
यं ग्राम॑मावि॒शत॑ इ॒दमु॒ग्रं सहो॒ मम॑ । पि॑शा॒चास्तस्मा॑न्नश्यन्ति॒ न पा॒पमुप॑ जानते ॥ (८)
मंत्र के प्रभाव से उत्पन्न मेरा यह बल जिस ग्राम में प्रवेश कर के निवास करता है, पिशाच उस ग्राम से भाग जाता है. वहां रहने वाले लोग पिशाचों के हिंसा रूपी पाप को नहीं जानते. (८)
The vampire runs away from the village where this force of mine, generated by the effect of the mantra, enters and resides. People living there do not know the sin of violence of vampires. (8)
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