अथर्ववेद (कांड 5)
सु॑प॒र्णस्त्वान्व॑विन्दत्सूक॒रस्त्वा॑खनन्न॒सा । दिप्सौ॑षधे॒ त्वं दिप्स॑न्त॒मव॑ कृत्या॒कृतं॑ जहि ॥ (१)
हे ओषधि! सुपर्ण अर्थात् गरुड़ या सूर्य ने तुम्हें प्राप्त किया था. सुअर ने अपनी नाक से तुम्हें खोदा था. हे कृत्या से संबंधित ओषधि! तुम कृत्या का प्रयोग करने वाले और हमें मारने का प्रयत्न करने वाले का नाश करो. (१)
O medicine! Suparna i.e. Garuda or Sun received you. The pig dug you with its nose. O medicine related to the act! Destroy the one who uses the act and tries to kill us. (1)