अथर्ववेद (कांड 5)
अ॒ग्निरि॑वैतु प्रति॒कूल॑मनु॒कूल॑मिवोद॒कम् । सु॒खो रथ॑ इव वर्ततां कृ॒त्या कृ॑त्या॒कृतं॒ पुनः॑ ॥ (१३)
अग्नि की तरह कृत्याकारी से प्रतिकूल आचरण करती हुई वह कृत्या उस के पास पहुंचे. जिस प्रकार पानी किनारों को काटता हुआ बढ़ता है उसी प्रकार वह कृत्या कृत्याकारी के अनुकूल हो कर उस के पास पहुंचे. वह कृत्या सुखकारी रथ के समान कृत्याकारी के पास पुनः चली आए. (१३)
Acting like agni, the act reached him, behaving adversely. Just as the water grows by cutting the edges, in the same way, it should be compatible with the act and reach it. He came back to Kriyakari like a Sukhkari Rath. (13)