अथर्ववेद (कांड 5)
एका॑ च मे॒ दश॑ च मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे । ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥ (१)
हे यज्ञ के निमित्त उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे एक और दस अर्थात् ग्यारह हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना. क्योंकि तू मधुर है. (१)
O medicine produced for the sake of yajna! Those who condemn Me may be one and ten, that is, eleven, but you make My voice sweet. Because you are sweet. (1)