हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.17.17

कांड 5 → सूक्त 17 → मंत्र 17 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 17
नास्मै॒ पृश्निं॒ वि दु॑हन्ति॒ येऽस्या॒ दोह॑मु॒पास॑ते । यस्मि॑न्रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या ॥ (१७)
जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी अचेत कर के रोकी जाती है, उस राष्ट्र में दूध दुहने की इच्छा करने वाले थोड़ा दूध भी नहीं दुह पाते. (१७)
In a nation where a Brahmin's wife is stopped unconscious, those who wish to milk cannot milk even a little milk. (17)