अथर्ववेद (कांड 5)
न ब्रा॑ह्म॒णो हिं॑सित॒व्यो॒ऽग्निः प्रि॒यत॑नोरिव । सोमो॒ ह्य॑स्य दाया॒द इन्द्रो॑ अस्याभिशस्ति॒पाः ॥ (६)
जिस प्रकार अपने शरीर को कोई नष्ट नहीं करना चाहता, उसी प्रकार अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण का नाश भी नहीं करना चाहिए. सोम ब्राह्मण का संबंधी हैं और इंद्र ब्राह्मण के शाप को पूर्ण करते हैं. (६)
Just as no one wants to destroy one's body, one should not destroy a bright Brahmin like agni. Som is a Brahmin and Indra fulfills the curse of Brahmin. (6)