अथर्ववेद (कांड 5)
ती॒क्ष्णेष॑वो ब्राह्म॒णा हे॑ति॒मन्तो॒ यामस्य॑न्ति शर॒व्यां॒ न सा मृषा॑ । अ॑नु॒हाय॒ तप॑सा म॒न्युना॑ चो॒त दु॒रादव॑ भिन्दन्त्येनम् ॥ (९)
ब्राह्मण अपने तप और क्रोध रूप बाणों को जिस की ओर फेंकता है, वे बेकार नहीं जाते. वे बाण दूर से ही शन्रु को वेध देते हैं. (९)
The Brahmin throws his arrows towards whom his penance and anger, they do not go waste. Those arrows pierce The Sharu from a distance. (9)