हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
विहृ॑दयं वैमन॒स्यं वदा॒मित्रे॑षु दुन्दुभे । वि॑द्वे॒षं कश्म॑शं भ॒यम॒मित्रे॑षु॒ नि द॑ध्म॒स्यव॑ एनान्दुन्दुभे जहि ॥ (१)
हे दुदुंभि! तू शत्रुओं में वैमनस्य फैला एवं उन के हृदयों में एकदूसरे के प्रति द्वेष भर दे हम अपने शत्रुओं में द्वेष की भावना फैलाना चाहते हैं. तू उन का तिरस्कार करती हुई उन्हें समाप्त कर दे. (१)
O milk! You spread disharmony among the enemies and fill their hearts with hatred towards each other, we want to spread a sense of malice among our enemies. You despise them and finish them. (1)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
उ॒द्वेप॑माना॒ मन॑सा॒ चक्षु॑षा॒ हृद॑येन च । धाव॑न्तु॒ बिभ्य॑तो॒ऽमित्राः॑ प्रत्रा॒सेनाज्ये॑ हु॒ते ॥ (२)
हमारे द्वारा होम किए गए घृत से हमारे शत्रु कंपित हों और मन, नेत्र तथा हृदय से भयभीत हो कर भाग जाएं. (२)
Our enemies should be shaken by the hatred done by us and run away in fear of mind, eye and heart. (2)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
वा॑नस्प॒त्यः संभृ॑त उ॒स्रिया॑भिर्वि॒श्वगो॑त्र्यः । प्र॑त्रा॒सम॒मित्रे॑भ्यो व॒दाज्ये॑ना॒भिघा॑रितः ॥ (३)
हे वनस्पति से बनी हुई दुदुंभी! तू चमड़े से मढ़ी हुई है तथा मेघ घटा के समान घोर शब्द करती है. घी से चुपड़ी हुई तू शत्रुओं को भय उत्पन्न करने वाला शब्द कर. (३)
O milkmine made of vegetation! You are covered with leather and say a very loud word like cloud ghata. You are silenced with ghee, make the words that create fear to the enemies. (3)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
यथा॑ मृ॒गाः सं॑वि॒जन्त॑ आर॒ण्याः पुरु॑षा॒दधि॑ । ए॒वा त्वं दु॑न्दुभे॒ऽमित्रा॑न॒भि क्र॑न्द॒ प्र त्रा॑स॒याथो॑ चि॒त्तानि॑ मोहय ॥ (४)
हे दुदुंभि! वनचारी शिकारी पुरुष से जिस प्रकार वन के पशु भयभीत होते हैं, उसी प्रकार तू अपने गर्जन से शत्रुओं को भयभीत करती हुई, उन के चित्तों को मोहित बना. (४)
O milk! Just as the animals of the forest are afraid of the forester hunter, in the same way, you have captivated the minds of the enemies, frightening the enemies with your roar. (4)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
यथा॒ वृका॑दजा॒वयो॒ धाव॑न्ति ब॒हु बिभ्य॑तीः । ए॒वा त्वं दु॑न्दुभे॒ऽमित्रा॑न॒भि क्र॑न्द॒ प्र त्रा॑स॒याथो॑ चि॒त्तानि॑ मोहय ॥ (५)
जिस प्रकार भेड़ें और बकरियां भेड़िए के कारण अधिक भयभीत हो कर भागती हैं, उसी प्रकार तू गड़गड़ाहट करती हुई शत्रुओं को भयभीत कर के उन का चित्त मोहित कर. (५)
Just as sheep and goats run away more frightened by wolves, so you frighten the thundering enemies and fascinate them. (5)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
यथा॑ श्ये॒नात्प॑त॒त्रिणः॑ संवि॒जन्ते॒ अह॑र्दिवि सिं॒हस्य॑ स्त॒नथो॒र्यथा॑ । ए॒वा त्वं दु॑न्दुभे॒ऽमित्रा॑न॒भि क्र॑न्द॒ प्र त्रा॑स॒याथो॑ चि॒त्तानि॑ मोहय ॥ (६)
हे दुदुंभि! जिस प्रकार बाज से सभी पक्षी और सिंह से सभी प्राणी भयभीत रहते हैं, उसी प्रकार तू शत्रुओं के प्रति गड़गड़ाहट कर के उन्हें भयभीत कर के उन के चित्तों को मोहित कर. (६)
O milk! Just as all birds are afraid of the eagle and all beings are afraid of the lion, so you rumble towards the enemies and frighten them and fascinate their minds. (6)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
परा॒मित्रा॑न्दुन्दु॒भिना॑ हरि॒णस्या॒जिने॑न च । सर्वे॑ दे॒वा अ॑तित्रस॒न्ये सं॑ग्रा॒मस्येश॑ते ॥ (७)
जो संग्राम के देवता हैं, उन्होंने हिरण के चमड़े से मढ़ी हुई दुदुंभि बजा कर शत्रुओं को भयभीत कर के पराजित किया. (७)
Those who are the gods of war, they defeated the enemies by beating the milk covered with deer leather. (7)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 21
यैरिन्द्रः॑ प्र॒क्रीड॑ते पद्घो॒षैश्छा॒यया॑ स॒ह । तैर॒मित्रा॑स्त्रसन्तु नो॒ऽमी ये यन्त्य॑नीक॒शः ॥ (८)
इंद्र जिन पदघोषों से खेलते हैं, उन से अधिक संख्या वाले शत्रु भयभीत हों. (८)
Enemies with more numbers are afraid of the footsteps with which Indra plays. (8)
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