अथर्ववेद (कांड 5)
उ॒द्वेप॑माना॒ मन॑सा॒ चक्षु॑षा॒ हृद॑येन च । धाव॑न्तु॒ बिभ्य॑तो॒ऽमित्राः॑ प्रत्रा॒सेनाज्ये॑ हु॒ते ॥ (२)
हमारे द्वारा होम किए गए घृत से हमारे शत्रु कंपित हों और मन, नेत्र तथा हृदय से भयभीत हो कर भाग जाएं. (२)
Our enemies should be shaken by the hatred done by us and run away in fear of mind, eye and heart. (2)