अथर्ववेद (कांड 5)
आदि॑त्य॒ चक्षु॒रा द॑त्स्व॒ मरी॑च॒योऽनु॑ धावत । प॑त्स॒ङ्गिनी॒रा स॑जन्तु॒ विग॑ते बाहुवी॒र्ये॑ ॥ (१०)
हे सर्प! तुम शत्रुओं के नेत्रों की देखने की शक्ति छीन लो. हे सूर्य किरणो! तुम दीड़ते हुए शत्रुओं की पीठ पर पड़ो. भुजाओं की शक्ति क्षीण होने पर जब शत्रु भागने लगे तो उन का साथ मत दो. (१०)
O serpent! Take away the power of seeing the eyes of enemies. O sun rays! You fall on the back of enemies. When the power of the arms is weak, when the enemies start running away, do not support them. (10)