अथर्ववेद (कांड 5)
ग॒न्धारि॑भ्यो॒ मूज॑व॒द्भ्योऽङ्गे॑भ्यो म॒गधे॑भ्यः । प्रै॒ष्यन् जन॑मिव शेव॒धिं त॒क्मानं॒ परि॑ दद्मसि ॥ (१४)
हम मूंज वाले स्थान से, अंग देश से, मध्य देश से और गांधार देश से कष्ट वाले रोग ज्वर को भगाते हुए सुखी बनते है. (१४)
We become happy by removing the painful disease fever from the place of moonj, from the country of the organ, from the middle country and from the country of Gandhara. (14)