हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.22.6

कांड 5 → सूक्त 22 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 22
तक्म॒न्व्या॑ल॒ वि ग॑द॒ व्य॑ङ्ग॒ भूरि॑ यावय । दा॒सीं नि॒ष्टक्व॑रीमिच्छ॒ तां वज्रे॑ण॒ सम॑र्पय ॥ (६)
हे जीवन को सर्प के समान कष्ट देने वाले ज्वर! तू चोरी कर ने वाली दासी से वज्र रूप में मिल और हम से अपनेआप को दूर रख. (६)
O fever that hurts life like a serpent! Meet the stolen maid as a thunderbolt and keep yourself away from us. (6)