अथर्ववेद (कांड 5)
तक्म॒न्व्या॑ल॒ वि ग॑द॒ व्य॑ङ्ग॒ भूरि॑ यावय । दा॒सीं नि॒ष्टक्व॑रीमिच्छ॒ तां वज्रे॑ण॒ सम॑र्पय ॥ (६)
हे जीवन को सर्प के समान कष्ट देने वाले ज्वर! तू चोरी कर ने वाली दासी से वज्र रूप में मिल और हम से अपनेआप को दूर रख. (६)
O fever that hurts life like a serpent! Meet the stolen maid as a thunderbolt and keep yourself away from us. (6)