अथर्ववेद (कांड 5)
यो अ॒क्ष्यौ॑ परि॒सर्प॑ति॒ यो नासे॑ परि॒सर्प॑ति । द॒तां यो मद्यं॒ गच्छ॑ति॒ तं क्रिमिं॑ जम्भयामसि ॥ (३)
जो कृमि आंखों में घूमते हैं जो नाखूनों में चलतेफिरते हैं तथा जो दांतों के मध्य निवास करते हैं, उन कृमियों को हम नष्ट करते हैं. (३)
We destroy the worms that move in the eyes, which move in the nails and those who live between the teeth. (3)