अथर्ववेद (कांड 5)
म॒रुतः॒ पर्व॑ताना॒मधि॑पतय॒स्ते मा॑वन्तु । अ॒स्मिन्ब्रह्म॑ण्य॒स्मिन्कर्म॑ण्य॒स्यां पु॑रो॒धाया॑म॒स्यां प्र॑ति॒ष्ठाया॑म॒स्यां चित्त्या॑म॒स्यामाकू॑त्याम॒स्यामा॒शिष्य॒स्यां दे॒वहू॑त्यां॒ स्वाहा॑ ॥ (६)
मरुद्गण पर्वतों के अधिपति हैं. वे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाहूवान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (६)
The Deserts are the overswamis of the mountains. May they protect me in this Vedokta Paurohitya karma, in prestige, in resolve, in Devahuvana karma and in karma as a blessing. (6)