अथर्ववेद (कांड 5)
पर्व॑ताद्दि॒वो योने॒रङ्गा॑दङ्गात्स॒माभृ॑तम् । शेपो॒ गर्भ॑स्य रेतो॒धाः सरौ॑ प॒र्णमि॒वा द॑धत् ॥ (१)
पर्वत की ओषधि, स्वर्ग के पुण्य और अंगों की शक्ति से पुष्ट वीर्य धारण करने वाला पुरुष जल में पत्ते के समान गर्भाधान करता है. (१)
A man who holds semen strengthened by the medicinal of the mountain, the virtue of heaven and the power of the organs insemination like a leaf in water. (1)