हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.28.6

कांड 5 → सूक्त 28 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 28
त्रे॒धा जा॒तं जन्म॑ने॒दं हिर॑ण्यम॒ग्नेरेकं॑ प्रि॒यत॑मं बभूव॒ सोम॒स्यैकं॑ हिंसि॒तस्य॒ परा॑पतत् । अ॒पामेकं॑ वे॒धसां॒ रेत॑ आहु॒स्तत्ते॒ हिर॑ण्यं त्रि॒वृद॒स्त्वायु॑षे ॥ (६)
जन्म से ही यह स्वर्ण तीन प्रकार से उत्पन्न हुआ है. अग्नि को उस स्वर्ण का एक जन्म प्रिय हुआ. वह सोम के पीड़ित होने पर गिरा. विद्वान्‌ लोग एक को जलों का वीर्य कहते थे. हे ब्रह्मचारी! वह स्वर्ण तेरी आयु वृद्धि के हेतु त्रिवृत्त अर्थात्‌ तिगुना हो जाए. (६)
Since birth, this gold has been born in three ways. Agni loved one birth of that gold. He fell when Som suffered. Scholars used to call one the semen of waters. O brahmachari! That gold should triple to increase your life. (6)