अथर्ववेद (कांड 5)
स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न्न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः । स॒हमू॑रा॒ननु॑ दह क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः ॥ (११)
हे अग्नि! तुम सदा से राक्षसों का मर्दन करते आए हो, राक्षस युद्ध में तुम्हें कभी नहीं जीत सके हैं, तुम मांस भक्षियों को जला दो. ये तुम्हारे दिव्य अस्त्र से बच न सकें. (११)
O agni! You have always been killing demons, demons have never been able to conquer you in battle, you burn meat eaters. They cannot escape your divine weapon. (11)