अथर्ववेद (कांड 5)
स॒माह॑र जातवेदो॒ यद्धृ॒तं यत्परा॑भृतम् । गात्रा॑ण्यस्य वर्धन्तामं॒शुरि॒वा प्या॑यताम॒यम् ॥ (१२)
हे अग्नि! इस मनुष्य का जो ज्ञान और मांस नष्ट हो गया है, उसे तुम पुनः इस के शरीर में लाओ. यह सोमलता के अंकुर के समान पुष्ट हो तथा इस के अंगप्रत्यंग पूर्ण हों. (१२)
O agni! Bring back the knowledge and flesh of this man that has been destroyed, bring it back into his body. It should be as strong as the seedling of Somalata and its limbs should be complete. (12)