हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.30.10

कांड 5 → सूक्त 30 → मंत्र 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
ऋषी॑ बोधप्रतीबो॒धाव॑स्व॒प्नो यश्च॒ जागृ॑विः । तौ ते॑ प्रा॒णस्य॑ गो॒प्तारौ॒ दिवा॒ नक्तं॑ च जागृताम् ॥ (१०)
जो बोध, प्रतिबोध, स्वप्र और जागृति नामक तेरे प्राणरक्षक ऋषि हैं, वे रातदिन जागते रहें, (१०)
May those who are your life-saving sages, called realization, remembrance, self-realization, and awakening, stay awake day and night, (10)