हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
आ॒वत॑स्त आ॒वतः॑ परा॒वत॑स्त आ॒वतः॑ । इ॒हैव भ॑व॒ मा नु गा॒ मा पूर्वा॒ननु॑ गाः पि॒तॄनसुं॑ बध्नामि ते दृ॒ढम् ॥ (१)
मैं समीप के देश से और दूर के देश से तेरे प्राणों को दृढ़ता से बांधता हूं. तू यहीं रह और अपने पूर्ववर्ती पितरों का अनुकरण मत कर. (१)
I bind your life firmly from the nearest country and from the distant country. You stay here and don't follow your previous ancestors. (1)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
यत्त्वा॑भिचे॒रुः पुरु॑षः॒ स्वो यदर॑णो॒ जनः॑ । उ॑न्मोचनप्रमोच॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते ॥ (२)
पितृऋण को न चुकाने वाले जिस पुरुष ने तुझ पर अधिकार किया है, मैं उस से छूटने का उपाय अपने मंत्र बल से तुझे बताता हूं. (२)
I tell you with my mantra the way to get rid of the man who has not repaid the father's debt over you. (2)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
यद्दु॒द्रोहि॑थ शेपि॒षे स्त्रि॒यै पुं॒से अचि॑त्त्या । उ॑न्मोचनप्रमोच॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते ॥ (३)
वूने जिस स्त्री अथवा पुरुष के प्रति वैरभाव रखते हुए इस पापपूर्ण अभिचार का प्रयोग किया है, मैं तुझे उस से मुक्त करने से संबंधित बात बताता हूं. (३)
I tell you about freeing you from the woman or man whom you have used this sinful act with enmity. (3)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
यदेन॑सो मा॒तृकृ॑ता॒च्छेषे॑ पि॒तृकृ॑ताच्च॒ यत् । उ॑न्मोचनप्रमोच॒ने उ॒भे वा॒चा व॑दामि ते ॥ (४)
तू अपने पिता अथवा माता द्वारा किए गए पाप के कारण रोगी हो कर शय्या पर पड़ा है. मैं अपनी वाणी से उस रोग से उन्मोचन और प्रमोचन की बात तुझे बताता हूं. (४)
You are sick and lying on the bed because of the sin committed by your father or mother. I tell you with my voice about the removal and release from that disease. (4)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
यत्ते॑ मा॒ता यत्ते॑ पि॒ता जा॒मिर्भ्राता॑ च॒ सर्ज॑तः । प्र॒त्यक्से॑वस्व भेष॒जं ज॒रद॑ष्टिं कृणोमि त्वा ॥ (५)
तेरी माता, तेरे पिता, तेरे भाई अथवा तेरी बहन ने जिस मंत्र अथवा ओषधि का प्रयोग तेरे लिए निश्चित किया है, उसे भली प्रकार से सेवन कर. मैं तुझे वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाता हूं. (५)
Take the mantra or medicine that your mother, your father, your brother or your sister has decided to use for you. I make you live to old age. (5)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
इ॒हैधि॑ पुरुष॒ सर्वे॑ण॒ मन॑सा स॒ह । दू॒तौ य॒मस्य॒ मानु॑ गा॒ अधि॑ जीवपु॒रा इ॑हि ॥ (६)
हे पुरुष! तू यमराज के दूतों का अनुकरण मत कर अर्थात्‌ मर मत. तू अपने समस्त परिवार जनों के साथ यहां जीवित रह. (६)
O man! Do not follow the messengers of Yamraj, that is, do not die. You live here with all your family members. (6)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
अनु॑हूतः॒ पुन॒रेहि॑ वि॒द्वानु॒दय॑नं प॒थः । आ॒रोह॑णमा॒क्रम॑णं॒ जीव॑तोजीव॒तोऽय॑नम् ॥ (७)
तू उदय होने के मार्ग को जानने वाला है और इस यज्ञ कर्म के द्वारा बुलाया गया है. उत्तरायण एवं दक्षिणायन तेरे जीवन में ही व्यतीत हों. (७)
You are going to know the path of rise and have been called by this sacrificial deed. May Uttarayan and Dakshinayan be spent in your life. (7)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
मा बि॑भे॒र्न म॑रिष्यसि ज॒रद॑ष्टिं कृणोमि त्वा । निर॑वोचम॒हं यक्ष्म॒मङ्गे॑भ्यो अङ्गज्व॒रं तव॑ ॥ (८)
हे रोगी! तू भय त्याग दे, क्योंकि तू मरेगा नहीं. मैं तुझे वृद्धावस्था तक इस लोक में रहने योग्य बनाता हूं. तेरे शरीर में से यक्ष्मा रोग और अस्थिगत ज्वर दूर हो चुका है. (८)
O patient! Give up fear, for you will not die. I enable you to live in this world till your old age. Tuberculosis and bone fever have been removed from your body. (8)
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