हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.31.9

कांड 5 → सूक्त 31 → मंत्र 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 31
यां ते॑ च॒क्रुः पु॑रुषा॒स्थे अ॒ग्नौ संक॑सुके च॒ याम् । म्रो॒कं नि॑र्दा॒हं क्र॒व्यादं॒ पुनः॒ प्रति॑ हरामि॒ ताम् ॥ (९)
हे कृत्या! अभिचार करने वाले मांसभक्षी ने तुझे पुरुष की हड्डी पर अथवा प्रकाशित अग्नि पर स्थित किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (९)
O act! The man-eating eater has placed you on the male bone or on the illuminated agni. We return you to him who sent you. (9)