हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.6.12

कांड 5 → सूक्त 6 → मंत्र 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
इन्द्र॑स्य शर्मासि । तं त्वा॒ प्र प॑द्ये॒ तं त्वा॒ प्र वि॑शामि॒ सर्व॑गुः॒ सर्व॑पूरुषः॒ सर्वा॑त्मा॒ सर्व॑तनूः स॒ह यन्मेऽस्ति॒ तेन॑ ॥ (१२)
हे अग्नि! तुम इंद्र के मुख, सर्वत्र गमन करने वाले, सब की आत्मा, सब के शरीर एवं सब के पुरुष हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१२)
O agni! You are the face of Indra, the one who travels everywhere, the soul of all, the body of all and the man of all. I have come to your shelter along with all my colleagues. (12)