अथर्ववेद (कांड 5)
इन्द्र॑स्य॒ वरू॑थमसि । तं त्वा॒ प्र प॑द्ये॒ तं त्वा॒ प्र वि॑शामि॒ सर्व॑गुः॒ सर्व॑पूरुषः॒ सर्वा॑त्मा॒ सर्व॑तनूः स॒ह यन्मेऽस्ति॒ तेन॑ ॥ (१४)
हे अग्नि! तुम इंद्र के सैनिक, सर्वत्र गमन करने वाले, सब के पुरुष, सब की आत्मा और सब के शरीर हो. मैं अपने सभी सहयोगियों सहित तुम्हारी शरण में आया हूं. (१४)
O agni! You are the soldiers of Indra, the ones who travel everywhere, the men of all, the souls of all and the bodies of all. I have come to your shelter along with all my colleagues. (14)