अथर्ववेद (कांड 5)
या म॑ह॒ती म॒होन्मा॑ना॒ विश्वा॒ आशा॑ व्यान॒शे । तस्यै॑ हिरण्यके॒श्यै निरृ॑त्या अकरं॒ नमः॑ ॥ (९)
असमृद्धि अर्थात् दरिद्रता हमारी सभी आशाओं को सीमित कर रही है. सुनहरे केशों वाली इस असमृद्धि को मैं नमस्कार करता हूं. (९)
Poverty is limiting all our hopes. I salute this unfriendly with golden hair. (9)