अथर्ववेद (कांड 6)
येन॑ कृ॒षं वा॒जय॑न्ति॒ येन॑ हि॒न्वन्त्यातु॑रम् । तेना॒स्य ब्र॑ह्मणस्पते॒ धनु॑रि॒वा ता॑नया॒ पसः॑ ॥ (२)
जिस रस के द्वारा वीर्यरहित पुरुष को प्रजनन समर्थ बनाया जाता है, जिस रस के द्वारा रोगी पुरुष को प्रसन्न किया जाता है, हे मंत्रसमूह के पालक देव! उसी रस विशेष से इस पुरुष की इंद्रिय को धनुष के समान विस्तृत करो. (२)
The juice by which the semenless man is made reproductive, the juice by which the patient man is pleased, O foster god of the mantra group! Expand this man's senses like a bow with the same juice. (2)