हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.101.1

कांड 6 → सूक्त 101 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 101
आ वृ॑षायस्व श्वसिहि॒ वर्ध॑स्व प्र॒थय॑स्व च । य॑था॒ङ्गं व॑र्धतां॒ शेप॒स्तेन॑ यो॒षित॒मिज्ज॑हि ॥ (१)
हे पुरुष! तू सांड़ के समान गर्भाधान समर्थ हो एवं जीवित रहे. तेरे अंगों का विकास हो और तेरा शरीर विस्तीर्ण हो. जैसे तेरी जननेंद्रिय बढ़े, वैसे ही तू संभोग की इच्छुक नारी के समीप जा. (१)
O man! May you be able to conceive like a bull and live. May your organs develop and your body expand. As your genitals grow, so you go near a woman willing to have sexual intercourse. (1)