हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.104.2

कांड 6 → सूक्त 104 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 104
इ॒दमा॒दान॑मकरं॒ तप॒सेन्द्रे॑ण॒ संशि॑तम् । अ॒मित्रा॒ येऽत्र॑ नः॒ सन्ति॒ तान॑ग्न॒ आ द्या॒ त्वम् ॥ (२)
मैं ने तप के द्वारा बांधने का साधन यह पाश यंत्र निर्मित किया है. इसे इंद्र ने पहले ही तेज कर दिया है. इस संग्राम में हमारे जो शत्रु हैं, हे अग्नि! उन सब को पाश बंधन से बांधो. (२)
I have created this loop instrument to bind by penance. Indra has already intensified it. Our enemies in this struggle, O Agni! Tie them all to the loop bond. (2)