हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 116
यद्या॒मं च॒क्रुर्नि॒खन॑न्तो॒ अग्रे॒ कार्षी॑वणा अन्न॒विदो॒ न वि॒द्यया॑ । वै॑वस्व॒ते राज॑नि॒ तज्जु॑हो॒म्यथ॑ य॒ज्ञियं॒ मधु॑मदस्तु॒ नोऽन्न॑म् ॥ (१)
खेती करने वाले किसानों ने प्राचीनकाल में भूमि को खोदते हुए जो यम संबंधी क्रूर कर्म किया था, वे बुरे और भले काम में विभाजन न करने के कारण जानकार नहीं थे. घृत, मधु, तेल से युक्त अन्न हम अदिति पुत्र देवों और यमराज के लिए हवन करते हैं. इस के पश्चात वह यज्ञ योग्य अन्न मधुरता युक्त तथा हमारे भोग करने योग्य है. (१)
The cruel deeds of Yama that the farming farmers had done while digging the land in ancient times were not knowledgeable due to the lack of division between bad and good work. We perform havan for Aditi's son Devas and Yamraj. After this, that sacrificial food is sweet and worthy of our enjoyment. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 116
वै॑वस्व॒तः कृ॑णवद्भाग॒धेयं॒ मधु॑भागो॒ मधु॑ना॒ सं सृ॑जाति । मा॒तुर्यदेन॑ इषि॒तं न॒ आग॒न्यद्वा॑ पि॒ताऽप॑राद्धो जिही॒डे ॥ (२)
विवस्वान अर्थात्‌ सूर्य के पुत्र यमराज अपने लिए हवि का भाग करें तथा माधुर्य से युक्त उस भाग को हमें प्रदान करें. माता के पास से जो पाप हम अपराध करने वालों के पास आया है अथवा पिता हमारे द्वारा किए गए अपराध से क्रोधित है, वह पाप भी शांत हो. (२)
Vivasvan i.e. Yamraj, the son of the Sun, should share the havi for himself and give us that part containing melody. The sin that has come from the mother to us who commit sins or the father is angry with the crime committed by us, that sin should also be calmed down. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 116
यदी॒दं मा॒तुर्यदि॑ पि॒तुर्नः॒ परि॒ भ्रातुः॑ पु॒त्राच्चेत॑स॒ एन॒ आग॑न् । याव॑न्तो अ॒स्मान्पि॒तरः॒ सच॑न्ते॒ तेषां॒ सर्वे॑षां शि॒वो अ॑स्तु म॒न्युः ॥ (३)
दिखाई देता हुआ यह पाप यदि हमारे मातापिता, भाई, किसी परिजन, पुत्र अथवा आत्मीय व्यक्ति के पास से आया है, उस पाप के कारण क्रोधित जितने पितर हमारे समीप आते हैं, उन सब का क्रोध शांत हो. (३)
If this visible sin has come from our parents, brothers, any family, son or close person, due to that sin, the anger of all the ancestors who come near us, all their anger should be calmed. (3)