अथर्ववेद (कांड 6)
यदी॒दं मा॒तुर्यदि॑ पि॒तुर्नः॒ परि॒ भ्रातुः॑ पु॒त्राच्चेत॑स॒ एन॒ आग॑न् । याव॑न्तो अ॒स्मान्पि॒तरः॒ सच॑न्ते॒ तेषां॒ सर्वे॑षां शि॒वो अ॑स्तु म॒न्युः ॥ (३)
दिखाई देता हुआ यह पाप यदि हमारे मातापिता, भाई, किसी परिजन, पुत्र अथवा आत्मीय व्यक्ति के पास से आया है, उस पाप के कारण क्रोधित जितने पितर हमारे समीप आते हैं, उन सब का क्रोध शांत हो. (३)
If this visible sin has come from our parents, brothers, any family, son or close person, due to that sin, the anger of all the ancestors who come near us, all their anger should be calmed. (3)