हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.117.3

कांड 6 → सूक्त 117 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 117
अ॑नृ॒णा अ॒स्मिन्न॑नृ॒णाः पर॑स्मिन्तृ॒तीये॑ लो॒के अ॑नृ॒णाः स्या॑म । ये दे॑व॒यानाः॑ पितृ॒याणा॑श्च लो॒काः सर्वा॑न्प॒थो अ॑नृ॒णा आ क्षि॑येम ॥ (३)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इस लोक में, स्वर्ग आदि परलोकों में तथा स्वर्ग से उत्तम लोक में ऋण रहित हो कर जाऊं. जो देवों के गमन के लोक हैं, पितरों के गमन से लोक हैं, मैं वहां ऋण रहित हो कर ही जाऊं. (३)
O agni! By Your grace, I will go to this world, heaven, etc. and from heaven to the better world without debt. Those who are the world of the movement of gods, those who are the people of the movement of ancestors, I should go there without debt. (3)