अथर्ववेद (कांड 6)
यद्धस्ता॑भ्यां चकृ॒म किल्बि॑षाण्य॒क्षाणां॑ ग॒त्नुमु॑प॒लिप्स॑मानाः । उ॑ग्रंप॒श्ये उ॑ग्र॒जितौ॒ तद॒द्याप्स॒रसा॒वनु॑ दत्तामृ॒णं नः॑ ॥ (१)
इंद्रियों के विषयों-शब्द, स्पर्श, रूप आदि को प्राप्त करने के लिए हम ने जो पाप किए हैं, हे उग्रंपश्या एवं उग्रजिता नाम की अप्सराओ! आज हमारा ऋण अनुकूल रूप से धनी को चुकाओ, जिस से हम उत्ऋण हो सकें. (१)
The sins we have committed to attain the subjects of the senses - words, touches, forms, etc., O Apsarao named Ugrampshya and Ugrajita! Today, repay our debt to the rich favorably, so that we can repay. (1)