हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 118
यद्धस्ता॑भ्यां चकृ॒म किल्बि॑षाण्य॒क्षाणां॑ ग॒त्नुमु॑प॒लिप्स॑मानाः । उ॑ग्रंप॒श्ये उ॑ग्र॒जितौ॒ तद॒द्याप्स॒रसा॒वनु॑ दत्तामृ॒णं नः॑ ॥ (१)
इंद्रियों के विषयों-शब्द, स्पर्श, रूप आदि को प्राप्त करने के लिए हम ने जो पाप किए हैं, हे उग्रंपश्या एवं उग्रजिता नाम की अप्सराओ! आज हमारा ऋण अनुकूल रूप से धनी को चुकाओ, जिस से हम उत्ऋण हो सकें. (१)
The sins we have committed to attain the subjects of the senses - words, touches, forms, etc., O Apsarao named Ugrampshya and Ugrajita! Today, repay our debt to the rich favorably, so that we can repay. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 118
उग्रं॑पश्ये॒ राष्ट्र॑भृ॒त्किल्बि॑षाणि॒ यद॒क्षवृ॑त्त॒मनु॑ दत्तं न ए॒तत् । ऋ॒णान्नो॒ नर्णमेर्त्स॑मानो य॒मस्य॑ लो॒के अधि॑रज्जु॒राय॑त् ॥ (२)
हे उग्रंपश्या और राष्ट्रभीति नामक अप्सराओ! हम ने जो पाप किए हैं जैसे इंद्रियों का निषिद्ध विषयों में जाना; हमारे ऊपर ऋण के रूप में चढ़ा हुआ जो पाप है, उसे हमारे अनुकूल हो कर समाप्त कर दो. इस से हमारे ऋणी होने के कारण यमराज इस लोक में पाश ले कर हमें पकड़ने न आ सकें. (२)
O apsaras called Ugrafpala and Rashtrabhitiya! the sins we have committed such as the senses going into forbidden subjects; Eliminate the sin that is in the form of debt on us, be favorable to us. Due to our indebtedness to this, Yamraj could not come to catch us by taking a loop in this world. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 118
यस्मा॑ ऋ॒णं यस्य॑ जा॒यामु॒पैमि॒ यं याच॑मानो अ॒भ्यैमि॑ देवाः । ते वाचं॑ वादिषु॒र्मोत्त॑रां॒ मद्देव॑पत्नी॒ अप्स॑रसा॒वधी॑तम् ॥ (३)
मैं जिस धनी का ऋण धारण करता हूं, मैं कामुक बन कर जिस की पत्नी के पास जाता हूं अथवा जिस पुरुष के पास मैं ऋण के रूप में धन मांगने के लिए जाता हूं, हे देव! वे सब मुझ से प्रतिकूल बातें न कहें. हे अप्सराओ! मेरी यह बात अपने मन में धारण करो. (३)
The rich man whose debt I bear, whose wife I go to as a sensual or the man I go to ask for money in the form of a loan, O Dev! They should not say adverse things to me. O nymphs! Hold this thing of mine in your mind. (3)