हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.124.1

कांड 6 → सूक्त 124 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 124
दि॒वो नु मां बृ॑ह॒तो अ॒न्तरि॑क्षाद॒पां स्तो॒को अ॒भ्यपप्त॒द्रसे॑न । समि॑न्द्रि॒येण॒ पय॑सा॒हम॑ग्ने॒ छन्दो॑भिर्य॒ज्ञैः सु॒कृतां॑ कृ॒तेन॑ ॥ (१)
द्युलोक से अथवा विशाल मेघ रहित आकाश से जल की बूंद मेरे ऊपर गिरी. हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इंद्र देव के चिह्न जल से संयुक्त बनूं. मैं वेदमंत्रों और यज्ञों के माध्यम से पुण्यवान जनों द्वारा किए गए कर्म की सहायता से उत्तम फल प्राप्त करूं. (१)
A drop of water fell on me from the dark or from the sky without a huge cloud. O agni! By your grace, I should be united with the sign water of Indra Dev. I should get the best results with the help of the deeds done by the virtuous people through Vedamantras and Yagyas. (1)