अथर्ववेद (कांड 6)
यदि॑ वृ॒क्षाद॒भ्यप॑प्त॒त्पलं॒ तद्यद्य॒न्तरि॑क्षा॒त्स उ॑ वा॒युरे॒व । यत्रास्पृ॑क्षत्त॒न्वो॒ यच्च॒ वास॑स॒ आपो॑ नुदन्तु॒ निरृ॑तिं परा॒चैः ॥ (२)
वृक्ष से पानी की जो बूंद मेरे ऊपर गिरी, वह उस वृक्ष का फल ही है. मेघ रहित आकाश से जो बूंद मेरे ऊपर गिरी, वह वायु भी है. वर्षा की वे बूंदें मेरे शरीर का स्पर्श करती हैं अथवा मेरे वस्त्रों को भिगोती हैं. वे बूंदें पाप देवता निर्त्ऋति का प्रक्षालन करने में समर्थ होने के कारण मेरे पापों को दूर करें. (२)
The drop of water that fell on me from the tree is the fruit of that tree. The drop that fell on me from the cloudless sky is also air. Those drops of rain touch my body or soak my clothes. May those drops remove my sins by being able to clean the sin god Nirtriti. (2)