अथर्ववेद (कांड 6)
अ॒भ्यञ्ज॑नं सुर॒भि सा समृ॑द्धि॒र्हिर॑ण्यं॒ वर्च॒स्तदु॑ पू॒त्रिम॑मे॒व । सर्वा॑ प॒वित्रा॒ वित॒ताध्य॒स्मत्तन्मा ता॑री॒न्निरृ॑ति॒र्मो अरा॑तिः ॥ (३)
मेरे शरीर पर गिरी हुई वर्षा की बूंद सुगंधित तेल और उबटन मुझे पवित्र करने वाले ही हैं. पवित्रता के सभी कहे गए और न कहे गए साधन मेरे ऊपर फैले है. पवित्रता के साधनों से ढके हुए मेरे शरीर को पाप देवता निर्त्रति एवं कोई शत्रु अतिक्रमण न करे. (३)
The drop of rain falling on my body, fragrant oil and ubtan are going to sanctify me. All the said and unspeaked means of purity are spread over me. My body, covered with the means of purity, should be encroached upon by the sin god Nirtrati and no enemy. (3)