हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.125.3

कांड 6 → सूक्त 125 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 125
इन्द्र॒स्यौजो॑ म॒रुता॒मनी॑कं मि॒त्रस्य॒ गर्भो॒ वरु॑णस्य॒ नाभिः॑ । स इ॒मां नो॑ ह॒व्यदा॑तिं जुषा॒णो देव॑ रथ॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय ॥ (३)
हे दिव्य गुणों से युक्त रथ! तुम इंद्र के बल, मरुतों की सेना, मित्र अर्थात्‌ सूर्य के गर्भ और वरुण की नाभि हो. इस प्रकार के तुम हमारी यज्ञ क्रिया की सेवा करते हुए हवि को ग्रहण करो. (३)
O chariot with divine qualities! You are the strength of Indra, the army of the Maruts, the friends, the womb of the sun and the navel of Varuna. In this way, you should accept Havi while serving our yajna kriya. (3)